किराए पर घर लेना या देना आजकल बहुत आम है। शहरों में तो हर दूसरा व्यक्ति किराए के मकान में रहता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि किराए से जुड़े कुछ जरूरी नियम और कानून हैं जिन्हें मकान मालिक और किरायेदार दोनों को जानना बहुत जरूरी है। अगर आप इन नियमों को नहीं जानते तो आपको आगे चलकर बड़ी परेशानी हो सकती है। रेंट एग्रीमेंट कैसे बनाए, कितना सिक्योरिटी डिपॉजिट लिया जा सकता है, मकान मालिक कितना किराया बढ़ा सकता है, किरायेदार के क्या अधिकार हैं, मकान खाली कराने की क्या प्रक्रिया है – यह सब जानना बेहद जरूरी है। आइए विस्तार से समझते हैं भारत में घर किराए पर लेने-देने के सभी जरूरी नियम और कानून।
रेंट एग्रीमेंट क्यों जरूरी है
किराए पर मकान लेते या देते समय रेंट एग्रीमेंट बनवाना सबसे जरूरी काम है। यह एक लीगल डॉक्यूमेंट है जो मकान मालिक और किरायेदार के बीच समझौता होता है। इसमें किराए की रकम, सिक्योरिटी डिपॉजिट, किराया बढ़ोतरी के नियम, मेंटेनेंस की जिम्मेदारी, लॉक इन पीरियड, नोटिस पीरियड जैसी सभी शर्तें लिखी होती हैं। अगर बाद में कोई विवाद हो तो यह एग्रीमेंट कोर्ट में सबूत के तौर पर काम आता है। बिना एग्रीमेंट के किराए पर देना या लेना बहुत जोखिम भरा है। कई बार किरायेदार किराया नहीं देते या मकान खाली नहीं करते। मकान मालिक अचानक किराया बढ़ा देते हैं या बिना नोटिस के बाहर निकाल देते हैं। ऐसी सभी परेशानियों से बचने के लिए रेंट एग्रीमेंट जरूरी है।
रेंट एग्रीमेंट कैसे बनवाएं
रेंट एग्रीमेंट बनवाने के लिए स्टांप पेपर खरीदना होता है। हर राज्य में स्टांप ड्यूटी अलग-अलग होती है। आमतौर पर सालाना किराए का 1 से 5 प्रतिशत स्टांप ड्यूटी लगती है। महाराष्ट्र में ज्यादा है तो उत्तर प्रदेश में कम। स्टांप पेपर पर एग्रीमेंट टाइप करवाना होता है या हाथ से लिखना होता है। इसमें दोनों पक्षों की पूरी डिटेल्स – नाम, पता, आधार नंबर, मोबाइल नंबर। मकान का पूरा पता और विवरण। किराए की रकम और भुगतान की तारीख। सिक्योरिटी डिपॉजिट की रकम। एग्रीमेंट की अवधि – 11 महीने या 1 साल या ज्यादा। सभी नियम और शर्तें। फिर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर और दो गवाहों के हस्ताक्षर। कुछ राज्यों में एग्रीमेंट को रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्टर कराना जरूरी है।
11 महीने का एग्रीमेंट क्यों बनाया जाता है
ज्यादातर रेंट एग्रीमेंट 11 महीने के लिए बनाए जाते हैं। इसका कारण कानूनी है। अगर एग्रीमेंट 12 महीने यानी एक साल या उससे ज्यादा का हो तो उसे रजिस्ट्रार ऑफिस में अनिवार्य रूप से रजिस्टर कराना पड़ता है। रजिस्ट्रेशन में खर्च और समय दोनों ज्यादा लगता है। स्टांप ड्यूटी के अलावा रजिस्ट्रेशन फीस भी देनी पड़ती है। इसलिए लोग 11 महीने का एग्रीमेंट बनाते हैं जिसे रजिस्टर कराने की जरूरत नहीं होती। 11 महीने बाद यह एग्रीमेंट रिन्यू किया जा सकता है। नया स्टांप पेपर लेकर फिर से एग्रीमेंट बनाया जाता है। हालांकि अगर दोनों पक्ष लंबे समय के लिए एग्रीमेंट चाहते हैं तो 2-3 साल का भी बना सकते हैं लेकिन उसे रजिस्टर जरूर कराना होगा।
सिक्योरिटी डिपॉजिट कितना लिया जा सकता है
मकान मालिक किरायेदार से सिक्योरिटी डिपॉजिट लेते हैं। यह एक तरह की जमानत होती है। अगर किरायेदार किराया नहीं देता, मकान में कोई नुकसान करता है या बिना नोटिस के चला जाता है तो इस डिपॉजिट से वसूली की जा सकती है। आमतौर पर सिक्योरिटी डिपॉजिट 2 से 3 महीने के किराए के बराबर होता है। बड़े शहरों में 2-3 महीने का चलता है तो छोटे शहरों में 1-2 महीने का। कुछ मकान मालिक 6 महीने या 1 साल का डिपॉजिट मांगते हैं जो गलत है। कानून में कोई तय सीमा नहीं है लेकिन 3 महीने से ज्यादा लेना अनुचित माना जाता है। डिपॉजिट की रकम रेंट एग्रीमेंट में साफ-साफ लिखी होनी चाहिए। मकान खाली करते समय यह पूरा पैसा वापस मिलना चाहिए।
किराया कब और कैसे दें
रेंट एग्रीमेंट में किराया देने की तारीख तय होती है। आमतौर पर महीने की 5 या 10 तारीख तक किराया दे दिया जाता है। कुछ जगह महीने की शुरुआत में एडवांस किराया लिया जाता है। किराया देने का सबसे अच्छा तरीका है बैंक ट्रांसफर या चेक। इससे सबूत रहता है कि आपने किराया दिया है। कैश में किराया देने से बचें। अगर कैश में देना जरूरी हो तो रसीद जरूर लें। रसीद पर मकान मालिक के हस्ताक्षर, तारीख, किराए की रकम और महीना साफ-साफ लिखा होना चाहिए। सभी रसीदें संभालकर रखें। कई बार विवाद में ये रसीदें काम आती हैं। किराया समय पर न देने पर मकान मालिक लेट फीस ले सकते हैं अगर यह एग्रीमेंट में लिखा हो।
मकान मालिक कितना किराया बढ़ा सकता है
यह एक बड़ा सवाल है। मकान मालिक हर साल या हर कुछ समय में किराया बढ़ाना चाहते हैं। कानून में किराया बढ़ोतरी की कोई तय सीमा नहीं है। यह पूरी तरह से रेंट एग्रीमेंट में लिखी शर्तों पर निर्भर करता है। आमतौर पर हर साल 5 से 10 प्रतिशत किराया बढ़ाया जा सकता है। अगर एग्रीमेंट में किराया बढ़ोतरी का क्लॉज नहीं है तो एग्रीमेंट की अवधि तक किराया नहीं बढ़ाया जा सकता। 11 महीने के एग्रीमेंट में पूरे 11 महीने किराया वही रहेगा जो तय किया गया था। रिन्यूअल के समय दोनों पक्ष मिलकर तय करते हैं कि किराया कितना बढ़ाना है। अगर किरायेदार नहीं मानता तो मकान मालिक उसे नोटिस देकर मकान खाली करवा सकता है।
मेंटेनेंस और रिपेयर की जिम्मेदारी
मकान की मेंटेनेंस की जिम्मेदारी किसकी है यह भी रेंट एग्रीमेंट में साफ-साफ लिखा होना चाहिए। आमतौर पर छोटी-मोटी रिपेयर जैसे बिजली के स्विच, पानी के नल, दरवाजे की कुंडी जैसी चीजों की मरम्मत किरायेदार की जिम्मेदारी होती है। बड़ी रिपेयर जैसे छत का लीक होना, दीवार में दरार, पानी की टंकी, पाइप लाइन, सेप्टिक टैंक जैसी चीजें मकान मालिक की जिम्मेदारी होती है। सोसाइटी मेंटेनेंस चार्ज आमतौर पर मकान मालिक देता है लेकिन कुछ जगह यह किरायेदार से वसूला जाता है। बिजली, पानी, गैस का बिल किरायेदार देता है। अगर ये सब बातें एग्रीमेंट में साफ नहीं हैं तो बाद में झगड़ा हो सकता है।
किरायेदार के अधिकार और कर्तव्य
किरायेदार के कुछ अधिकार होते हैं। उसे मकान में शांति से रहने का अधिकार है। मकान मालिक बिना पूर्व सूचना के अंदर नहीं आ सकता। प्राइवेसी का अधिकार है। अगर मकान में कोई बड़ी खराबी है तो उसे ठीक करवाने की मांग कर सकता है। समय पर किराया देते रहने पर जबरन बाहर नहीं निकाला जा सकता। लेकिन किरायेदार के कुछ कर्तव्य भी हैं। समय पर किराया देना। मकान का ख्याल रखना। कोई नुकसान न करना। शोर-शराबा या गलत काम न करना। पड़ोसियों को परेशान न करना। मकान मालिक की इजाजत के बिना मकान में बड़ा बदलाव न करना। सब-लेट यानी किसी और को किराए पर न देना। पालतू जानवर रखने से पहले अनुमति लेना।
मकान मालिक के अधिकार और कर्तव्य
मकान मालिक का अधिकार है कि वो समय पर किराया ले। अगर किरायेदार किराया नहीं दे रहा तो कानूनी कार्रवाई कर सकता है। मकान में कोई नुकसान हो तो उसकी भरपाई मांग सकता है। एग्रीमेंट खत्म होने पर मकान खाली करवा सकता है। लेकिन मकान मालिक के कुछ कर्तव्य भी हैं। मकान रहने लायक हालत में देना। बिजली, पानी की व्यवस्था सही रखना। बड़ी मरम्मत अपने खर्चे पर करना। किरायेदार को परेशान न करना। बिना नोटिस के अचानक अंदर न आना। एग्रीमेंट की शर्तों का पालन करना। प्रॉपर्टी टैक्स, सोसाइटी के नियमों का पालन करना। अगर मकान बेचना है तो किरायेदार को पहले बताना।
लॉक इन पीरियड क्या होता है
लॉक इन पीरियड का मतलब है वह समय जिसमें किरायेदार मकान नहीं छोड़ सकता और मकान मालिक उसे निकाल नहीं सकता। आमतौर पर 6 महीने या 1 साल का लॉक इन पीरियड होता है। इसमें अगर किरायेदार मकान छोड़ना चाहे तो उसे पेनल्टी देनी पड़ती है। पेनल्टी आमतौर पर 1 या 2 महीने के किराए के बराबर होती है। लॉक इन पीरियड इसलिए रखा जाता है ताकि मकान मालिक को बार-बार नया किरायेदार न ढूंढना पड़े। किरायेदार के लिए भी यह फायदेमंद है क्योंकि इस अवधि में मकान मालिक उसे नहीं निकाल सकता। लॉक इन पीरियड की सभी शर्तें रेंट एग्रीमेंट में साफ-साफ लिखी होनी चाहिए।
नोटिस पीरियड कितना होता है
नोटिस पीरियड का मतलब है कितने दिन पहले सूचना देनी होगी। अगर किरायेदार मकान छोड़ना चाहता है तो उसे कम से कम 1 से 3 महीने पहले लिखित में नोटिस देना होगा। अगर मकान मालिक किरायेदार को निकालना चाहता है तो उसे भी 1 से 3 महीने का नोटिस देना होगा। नोटिस पीरियड रेंट एग्रीमेंट में तय होता है। आमतौर पर 2 महीने का नोटिस पीरियड रखा जाता है। नोटिस लिखित में होना चाहिए और दोनों पक्षों के पास उसकी कॉपी होनी चाहिए। अगर कोई पक्ष बिना नोटिस के मकान छोड़ देता या निकाल देता है तो दूसरा पक्ष कानूनी कार्रवाई कर सकता है। नोटिस पीरियड का पालन बहुत जरूरी है।
मकान खाली करते समय क्या देखें
जब किरायेदार मकान खाली करता है तो मकान मालिक को पूरे मकान का निरीक्षण करना चाहिए। चेक करें कि कोई नुकसान तो नहीं हुआ। दीवारों पर निशान, टूटे हुए फिटिंग्स, खराब हुआ फर्नीचर, गंदगी आदि देखें। अगर कोई नुकसान है तो उसकी भरपाई सिक्योरिटी डिपॉजिट से काट सकते हैं। बिजली, पानी, गैस के सभी बिल क्लियर होने चाहिए। सोसाइटी के बकाए चेक करें। सब कुछ ठीक होने पर पूरा सिक्योरिटी डिपॉजिट वापस करें। किरायेदार को NOC यानी No Objection Certificate देना न भूलें। यह उसके काम आ सकता है। मकान की चाबियां वापस ले लें। रेंट एग्रीमेंट की एक कॉपी दोनों पक्ष संभालकर रखें। किसी विवाद में काम आ सकती है।
पुलिस वेरिफिकेशन जरूरी है
किराए पर मकान देते समय पुलिस वेरिफिकेशन बहुत जरूरी है। खासतौर पर अगर किरायेदार दूसरे शहर या राज्य से आया है। पुलिस वेरिफिकेशन के लिए किरायेदार को अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर फॉर्म भरना होता है। इसमें किरायेदार की पूरी डिटेल्स, पिछला पता, आधार, फोटो सब देना होता है। मकान मालिक को भी साइन करने होते हैं। पुलिस वेरिफिकेशन होने के बाद सर्टिफिकेट मिलता है। यह प्रोसेस 15-30 दिन में पूरी होती है। कई शहरों में ऑनलाइन भी पुलिस वेरिफिकेशन हो जाता है। यह सुरक्षा के लिहाज से बहुत जरूरी है। अगर किरायेदार कोई गलत काम करता है तो कम से कम उसकी डिटेल्स तो पुलिस के पास रहती है।
रेंट एग्रीमेंट का रजिस्ट्रेशन
अगर रेंट एग्रीमेंट 12 महीने या उससे ज्यादा का है तो उसे रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्टर कराना अनिवार्य है। रजिस्ट्रेशन के लिए स्टांप ड्यूटी के अलावा रजिस्ट्रेशन फीस भी देनी होती है। दोनों पक्षों को खुद जाकर रजिस्ट्रार के सामने हस्ताक्षर करने होते हैं। आधार कार्ड, फोटो जैसे दस्तावेज चाहिए। रजिस्ट्रेशन होने के बाद एक रजिस्टर्ड एग्रीमेंट मिलता है जो बहुत मजबूत लीगल डॉक्यूमेंट होता है। अगर विवाद हो तो कोर्ट में यह बहुत मान्य है। हालांकि ज्यादातर लोग 11 महीने का एग्रीमेंट बनाते हैं ताकि रजिस्ट्रेशन से बच सकें। लेकिन लंबी अवधि के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना बेहतर है।
किराए पर टैक्स कैसे भरें
अगर आप मकान मालिक हैं और किराया कमाते हैं तो आपको इनकम टैक्स भरना होता है। अगर सालाना किराया 2.5 लाख रुपये से ज्यादा है तो इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करना अनिवार्य है। किराए की आय को House Property Income में दिखाना होता है। किराए से 30 प्रतिशत स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। प्रॉपर्टी टैक्स, होम लोन का ब्याज भी घटाया जा सकता है। अगर आप किरायेदार हैं और HRA यानी House Rent Allowance क्लेम करते हैं तो रेंट रिसीप्ट देनी होती है। अगर सालाना किराया 1 लाख रुपये से ज्यादा है तो मकान मालिक का PAN नंबर भी देना होता है। टैक्स के मामले में हमेशा CA की सलाह लें।
किरायेदार को बेदखल कैसे करें
अगर किरायेदार किराया नहीं दे रहा, मकान में नुकसान कर रहा, गलत काम कर रहा या एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है तो मकान मालिक उसे बेदखल कर सकता है। सबसे पहले लिखित में नोटिस दें। अगर वो नहीं मानता तो रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत कोर्ट में केस दायर करना होगा। कोर्ट सुनवाई करेगा। अगर मकान मालिक सही साबित होता है तो कोर्ट किरायेदार को मकान खाली करने का आदेश देगा। यह प्रोसेस काफी लंबी हो सकती है – 6 महीने से लेकर 2-3 साल तक। इसलिए शुरुआत में ही अच्छा किरायेदार चुनना और प्रॉपर रेंट एग्रीमेंट बनवाना बहुत जरूरी है। वकील की मदद लें। कोशिश करें कि मामला कोर्ट तक न जाए और आपसी बातचीत से सुलझ जाए।
रेंट कंट्रोल एक्ट क्या है
भारत में Rent Control Act है जो किराए से जुड़े विवादों को सुलझाता है। हर राज्य का अपना रेंट कंट्रोल एक्ट है। यह एक्ट मकान मालिक और किरायेदार दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है। इसमें किराया कितना हो सकता है, कब बढ़ाया जा सकता है, किरायेदार को कब निकाला जा सकता है जैसे नियम हैं। अगर कोई विवाद है तो Rent Control Tribunal में केस दायर किया जा सकता है। यह कोर्ट से सस्ता और तेज होता है। हालांकि हाल के सालों में सरकार Model Tenancy Act लेकर आई है जो पुराने कानूनों से बेहतर है। कुछ राज्यों ने इसे लागू भी कर दिया है। नए कानून में किरायेदारी से जुड़े सभी मामले ज्यादा स्पष्ट हैं।
ऑनलाइन रेंट एग्रीमेंट बनाएं
आजकल ऑनलाइन रेंट एग्रीमेंट बनाने की सुविधा भी है। कई वेबसाइट और ऐप हैं जो e-Stamp के साथ ऑनलाइन एग्रीमेंट बनाते हैं। NoBroker, 99acres, LegalDesk जैसे प्लेटफॉर्म यह सेवा देते हैं। आपको बस दोनों पक्षों की डिटेल्स भरनी होती है। ऑनलाइन स्टांप ड्यूटी पे करनी होती है। एग्रीमेंट जेनरेट होकर ई-साइन से साइन हो जाता है। फिर आपके पते पर प्रिंटेड कॉपी भेज दी जाती है। यह प्रोसेस बहुत आसान और तेज है। 2-3 दिन में एग्रीमेंट तैयार हो जाता है। फीस भी कम लगती है – 500 से 2000 रुपये के बीच। ऑनलाइन एग्रीमेंट भी उतना ही वैलिड होता है जितना ऑफलाइन।
किराए पर घर लेते समय सावधानियां
किराए पर घर लेते समय कुछ जरूरी सावधानियां रखनी चाहिए। मकान और इलाके को अच्छी तरह देख लें। पड़ोस सही है या नहीं। बिजली-पानी की सप्लाई ठीक है या नहीं। सीलन, लीकेज जैसी समस्याएं तो नहीं। मकान मालिक से बात करके उसका व्यवहार समझें। पुराने किरायेदार से बात करें अगर मिलें तो। रेंट एग्रीमेंट को ध्यान से पढ़ें। सभी शर्तें समझ लें। कोई संदेह हो तो पूछें। मकान के सभी हिस्सों की फोटो खींचकर रखें। मीटर रीडिंग नोट कर लें। सभी फिटिंग्स काम कर रही हैं या नहीं चेक करें। अगर कुछ खराब है तो मकान मालिक को बताएं और लिखित में नोट करें। ऐसा न हो कि बाद में आप पर इल्जाम आ जाए।
मकान मालिक को भी सावधानी चाहिए
मकान मालिकों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। किरायेदार का पूरा बैकग्राउंड चेक करें। उसके पुराने मकान मालिक से बात करें। ऑफिस या कंपनी की जानकारी लें। सैलरी स्लिप या आय का प्रमाण मांगें। परिवार के सभी सदस्यों की जानकारी लें। आधार कार्ड, पैन कार्ड की कॉपी रखें। पुलिस वेरिफिकेशन जरूर करवाएं। रेंट एग्रीमेंट साफ और स्पष्ट बनाएं। सभी शर्तें डिटेल में लिखें। मकान की हालत की फोटो रखें। समय-समय पर मकान देखते रहें कि सब ठीक है या नहीं। किरायेदार से अच्छे संबंध रखें लेकिन नियमों में ढील न दें।
विवाद से कैसे बचें
ज्यादातर विवाद गलतफहमी या अस्पष्ट एग्रीमेंट की वजह से होते हैं। इनसे बचने के लिए शुरुआत से ही सब कुछ साफ रखें। रेंट एग्रीमेंट में सभी बातें विस्तार से लिखें। कोई मौखिक समझौता न करें। सब कुछ लिखित में हो। किराया देते या लेते समय रसीद रखें। बिल और खर्चों का हिसाब साफ रखें। आपस में अच्छा संवाद बनाए रखें। कोई समस्या हो तो तुरंत बात करके सुलझाएं। छोटी-छोटी बातों को बड़ा न होने दें। एक-दूसरे की प्राइवेसी और अधिकारों का सम्मान करें। थोड़ी समझदारी और संवेदनशीलता से ज्यादातर समस्याएं आसानी से सुलझ जाती हैं।
Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किराए से जुड़े कानून और नियम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकते हैं। Rent Control Act, Model Tenancy Act और दूसरे कानूनों में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं। स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन फीस और दूसरे चार्ज हर राज्य में अलग होते हैं। यहां दी गई जानकारी सामान्य गाइडलाइन है। किसी भी कानूनी निर्णय से पहले अपने राज्य के कानून की जानकारी लें। रेंट एग्रीमेंट बनवाने से पहले वकील की सलाह लेना उचित रहता है। किसी भी गंभीर विवाद में कानूनी मदद जरूर लें। यह लेख किसी कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है।
